• स्वास्थ्य सेवाएं सुधारने तेलंगाना सरकार का निर्णय अनुकरणीय

    भारत के संविधान का अनुच्छेद ३८ कहता है कि देश के नागरिकों को बेहतर चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व है

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    - डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

    भारत के संविधान का अनुच्छेद ३८ कहता है कि देश के नागरिकों को बेहतर चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व है। कोई भी अस्पताल किसी भी मरीज को इलाज करने से मना नहीं कर सकता और न ही अपाइंटमेंट देने में जान-बूझकर देरी कर सकता है। भारत में लोगों को आसान और सस्ती प्राइमरी हेल्थ केयर सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए बीमारियां बढ़ जाती हैं फिर उनके लिए महंगे इलाज की दरकार होती हैं।

    तेलंगाना सरकार ने ३५ साल पुराना अपना एक आदेश फिर से लागू कर दिया है, जिसके अनुसार सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले चिकित्सक प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं कर पाएंगे। यह भी तय किया गया है कि अब सरकारी अस्पतालों के लिए जो भी डॉक्टर नियुक्त होंगे, उन पर यह आदेश लागू रहेगा। तेलंगाना सरकार ने यह भी निर्देश दिया है कि जिन डॉक्टरों को प्रशासकीय ड्यूटी में नियुक्त कर दिया जाता है, उन्हें वहां से हटाकर वापस उनके मूल चिकित्सा कार्य में तैनात किया जाएगा।
    तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.चन्द्रशेखर राव ने इस बात का ऐलान करते हुए कहा कि इस व्यवस्था से सरकारी अस्पतालों में इलाज बेहतर हो पाएगा। तेलंगाना के चिकित्सा विभाग के सचिव ने इस पर सफाई दी है और कहा है कि सरकार ने केवल उन डॉक्टरों को ही प्राइवेट प्रैक्टिस से रोकने का फैसला किया है, जो नए नियुक्त होंगे। जो भी हो, तेलंगाना सरकार की यह पहल इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां सरकार १२७५५ डॉक्टरों की नियुक्ति करने जा रही है। सरकार चाहती है कि शासकीय अस्पतालों के डॉक्टर अपने सरकारी काम पर ही ध्यान केन्द्रित करें यानी तनख्वाह के अलावा कोई और आस न करें।

    अभी कर्नाटक में यह व्यवस्था है कि सरकारी अस्पतालों के चिकित्सक अपने निजी क्लीनिक या प्राइवेट अस्पताल में मरीजों को आवश्यक दवाओं की पर्चियां लिख सकते हैं। उन्हें अपना खुद का अस्पताल संचालित करने की अनुमति नहीं है और न ही वे किसी प्राइवेट अस्पताल में जाकर ऑपरेशन कर सकते हैं।
    मुख्यमंत्री के इस आदेश से वे नए डॉक्टर खुश नहीं हैं, जो सरकारी नौकरी भी चाहते हैं और प्राइवेट प्रैक्टिस करना भी। उनकी मांग है कि अगर तेलंगाना सरकार इस तरह का प्रतिबंध लगाती है, तो उनके वेतन में वृद्धि की जानी चाहिए, ताकि वे अपनी पढ़ाई का खर्च प्राप्त कर पाएं और जिन डॉक्टरों ने निजी मेडिकल कॉलेजों में मोटी फीस जमा की है, उसकी भरपाई हो सके।

    भारत की स्वास्थ्य सेवाओं और डॉक्टरों के प्रोफेशन को लेकर सबसे ज्यादा चिंता कोरोना काल के दौरान देखने में आई। ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह प्रभावित रहीं। अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में नीम हकीम और झोलाछाप डॉक्टर इलाज कर रहे हैं। भारत सरकार के अनुसार देश के शहरी क्षेत्रों में ५ हजार ८९५ प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में १.५ लाख से ज्यादा उप स्वास्थ्य केन्द्र और २५ हजार के करीब प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं। सरकार की योजना है कि ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों और उपकेन्द्रों का विस्तार हो और वे लोगों का इलाज नि:शुल्क कर सकें। यही लक्ष्य शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को लेकर भी है।

    सरकार का दावा है कि मरीजों को जरूरत पड़ने पर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के माध्यम से करीब १७५ तरह की दवाइयां वितरित की जाती हैं। ये प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के माध्यम से जरूरतमंदों की सेवा कर रहे हैं, जो आशा और एएमएम के माध्यम से की जाती थी। सरकार जो भी दावे करे, असलियत यह है कि भारत बीमार लोगों के लिए नहीं है। गरीब आदमी बीमारी की दशा में सरकारी अस्पतालों के चक्कर लगाता रहता है।

    कहने के लिए भारत के शहरों में एम्स जैसे आधुनिक अस्पताल भी हैं, लेकिन वहां मरीजों की इतनी भीड़ है कि इलाज कराते-कराते ही बीमारी और बढ़ जाती है।
    विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में बीमार होना किसी आर्थिक आपदा से कम नहीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में किसी भी गंभीर बीमारी का इलाज कराने के बाद ३२ प्रतिशत लोग हर साल गरीबी रेखा के नीचे पहुंच जाते हैं। सरकारी अस्पतालों में इलाज के नाम पर जितना पैसा खर्च होता है, उसका केवल २२ प्रतिशत ही सरकार करती है। ७८ प्रतिशत खर्च मरीज अपनी जेब से दवा और अन्य चिकित्सा सामग्री पर करता है। सरकारी खर्च का २२ प्रतिशत सामान्यत: डॉक्टरों-नर्सों की तनख्वाह और अस्पताल के रखरखाव पर ही खर्च होता है।

    भारत सरकार अपने बजट में स्वास्थ्य के नाम पर जीडीपी का २ प्रतिशत ही रखती है। कोरोना काल में भी स्वास्थ्य सेवा के नाम पर जो बजट घोषित किया गया था, वह बड़े प्राइवेट अस्पतालों के निर्माण और विस्तार पर कर्ज देने के काम में आया। इसका सीधा सा मतलब यह है कि सरकार चिकित्सा जैसे महत्वपूर्ण विषय को भी व्यावसायिक दृष्टि से देखती है और जनहित में कोई बड़ी धनराशि खर्च करने की नहीं सोचती।

    विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसे देश में इस तरह की व्यवस्था होनी चाहिए कि लोग बीमार होने के पहले ही सतर्क हो जाएं, यानी प्रिवेंटिव मेडिकल सुविधाओं का विस्तार करना चाहिए। कोई व्यक्ति बीमार होने पर अस्पताल जाए, इससे बेहतर है कि लोगों को सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में नियमित स्वास्थ्य जांच, परीक्षण, टीकाकरण और बच्चों की सेहत को बेहतर बनाने के बारे में कदम उठाए जाएं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत प्रिवेंटिव मेडिकल फेसिलिटी बढ़ाएं, तो लगभग ८० प्रतिशत बीमारियां रोकी जा सकती हैं।

    भारत के संविधान का अनुच्छेद ३८ कहता है कि देश के नागरिकों को बेहतर चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व है। कोई भी अस्पताल किसी भी मरीज को इलाज करने से मना नहीं कर सकता और न ही अपाइंटमेंट देने में जान-बूझकर देरी कर सकता है। भारत में लोगों को आसान और सस्ती प्राइमरी हेल्थ केयर सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए बीमारियां बढ़ जाती हैं फिर उनके लिए महंगे इलाज की दरकार होती हैं।

    भारत में चिकित्सा को लेकर कोई नीति है ही नहीं। सबको अपने हिसाब से काम करने की छूट है। कोई रोक-टोक नहीं। हेल्थ और ड्रग्स पॉलिसी इस तरह बनती है कि उसमें बड़ी-बड़ी अंतरराष्ट्रीय दवा कंपनियों को फायदा होता रहे। भारत में ही ऐसी दवाएं बिक रही हैं, जो मरीजों को इलाज से ज्यादा मौत की तरफ ले जाती हैं। कोरोना काल में हुई लाखों मौतें इस बात का सबूत हैं कि मृतकों में एक बड़ा वर्ग उन लोगों का था, जो ओवर मेडिसीन के शिकार हुए। कोरोना काल में डॉक्टरों ने अंदाज से इलाज किया।

    भारत में ड्रग्स लॉबी इस तरह हावी है कि वह सस्ती दवाएं बिकने ही नहीं देती। दिल के मरीजों को जो स्टंट ५० हजार से ५ लाख रुपये तक में लगाया जाता हैं, वैसा स्टंट या वाल्व पूर्व राष्ट्रपति एबीजे अब्दुल कलाम ने मात्र १० हजार रुपये में उपलब्ध कराने की व्यवस्था कर दी थी, लेकिन १० हजार रुपए के वाल्व में डॉक्टरों को कम कमाई होती, इसलिए इम्पोर्टेट वाल्व के नाम पर लाखों रुपये के वाल्व शरीर में लगा दिए जाते हैं। कैंसर की एक प्रमुख दवा सवा लाख रुपये में बिक रही हैं, जबकि उसका जेनेरिक वर्सन केवल ८ हजार रुपये में मिलता हैं, लेकिन बड़े अस्पताल, डॉक्टर, केमिस्ट आदि जेनेरिक वर्सन को बिकने नहीं देना चाहते।

    जब से बीमा कंपनियां स्वास्थ्य के क्षेत्र में कूदी हैं, तब से उन मरीजों की देखभाल करने वाला कोई है ही नहीं, जिनका बीमा नहीं होता। प्राइवेट अस्पताल बीमित मरीज का इलाज करने में ज्यादा रुचि लेते हैं और मनमाना बिल थमाते हैं। अस्पताल में नए पैकेज के हिसाब से इलाज करते हैं और बीमा कंपनियां ३ साल पुराने पैकेज के हिसाब से। केन्द्र और राज्य सरकार प्राइवेट अस्पतालों को व्यावसायिक गतिविधि मानती हैं। इसलिए जिस दर से मल्टी प्लेक्स को बिजली मिलती है, उसी भाव में अस्पताल को उपलब्ध होती है।

    भारत में महंगी चिकित्सा व्यवस्था की शुरुआत प्राइवेट मेडिकल कॉलेज से ही होती है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते रहे हैं कि हर जिले में एक मेडिकल कॉलेज खोलना उनकी सरकार का लक्ष्य है। अगर यह लक्ष्य पूरा होता है तो भारत में चिकित्सकों की कमी नहीं रहेगी।

    जब कभी सरकारी अस्पतालों को सुधारने की बातें होती हैं, तो सवाल उठता है कि उन्हें सुधारेगा कौन? जब भी हमारे नेताओं को इलाज की जरूरत होती है, वे विदेश जाकर अस्पताल में भर्ती हो जाते हैं। उनकी दूसरी पसंद भारत के कुछ पांच सितारा अस्पताल होते हैं। अस्पताल चाहे सरकारी हो या प्राइवेट-सुविधाजनक होने चाहिए। इसमें दो मत नहीं। आम धारणा है कि अगर हमारे नेता, ब्यूरोक्रेट्स और अन्य वीवीआईपी सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने जाएंगे, तो सरकारी अस्पतालों की दशा सुधारने की तरफ उनका ध्यान जाएगा। अभी तो यही कह सकते हैं कि तेलंगाना सरकार सरकारी अस्पतालों की दशा सुधारने के लिए जो पहल कर रही हैं, वह सराहनीय है। दूसरे राज्य भी ऐसी पहल करके शुरूआत कर सकते हैं।
    (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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